गुज़रता कुछ भी नहीं
पकता है भीतर
आइंस्टाइन के दुरूह सिद्धांत के बावजूद
तुम्हारी आँखों में रहती है
चौंधियाते उजाले से भरपूर एक रात
नासिका में बसीं
हजारों-हज़ार गंधों में एक खुशबू
नहीं जुड़ पाती किसी स्वाद के साथ
गाहे बगाहे
किसी दुःस्वप्न के कुटिल तर्क से भागते तुम
टूटती तंद्रा में पाते हो वे स्पर्श
जो होने न थे
न होने थे
समर्थ वाशिष्ठ
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