हमेशा स्केच पर एक हल्की लकीर
ओह करता हूँ जिन्हें प्यार
तुम्हारी आँखों के दंतुल मशीनी पहिये
किसी जुलूस की हिलती पूँछ
नारों की पीले चेहरे
सड़क पर कोण काटता रिक्शेवाला
भौतिकी के नियमों में ऐसी आस्था
कर देती मेरा चेहरा सुर्ख़.
शाम की सैर के दौरान
मिलते हैं ब्रेख्त खड़े सड़क किनारे
भावशून्य से लेते नोट्स
अपने प्यार को अलविदा कहते लड़के पर.
कितना कुछ है जो वे दो चाहेंगे अपने बीच
और होगा नहीं कभी.
यंत्रों की यकसां हलचल में
उनके जीवन हो जायेंगे अलग.
आकाश में कौंध रही है बिजली
और खाली बादल तकता है उसे
मैं जानता हूँ.
या ये कि मेरी प्लेट में सजे फ्रेंच-फ्रायज़
लगते हैं किसी सोमालियाई बच्चे की उँगलियों से.
या ये कि जो कुछ भी जीवन बचा है हमारी मुट्ठियों में
अनपढ़े शोक-पत्रों में करता है प्रतीक्षा.
विशवास में, गिनता हूँ तुम्हारे होठों की तहें.
विश्वासघात, मेरी आँखों में रड़कते हो तुम.
ब्यौरे जो जानता हूँ
कहते हैं हजारों किस्से.
ब्यौरे जो चाहिए
कहते नहीं एक भी शब्द.
हाँफते विःसर्ग जमते हैं उस समय के बीच
जिसमें एक खड़्ग करती है किसी धड़ को अलग.
गठीले सवार उधेड़ते हैं अपने घोड़ों की पीठें
उनकी चीखें, सोने नहीं देती मुझे.
धूसर सर्प रेंगते राजमार्गों पर दिन-रात
रेतांध, डसते अविराम.
समर्थ वाशिष्ठ
(नोट: डिजीटल घड़ियों में घंटे और मिनटों के बीच विःसर्ग होता है, जैसे 9:32 pm.)
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