दिल्ली

1

कैसा गज़ब है ये शहर
जहाँ कहीं से कहीं तक कोई बस नहीं जाती.

बसों से बसों तक चलती हैं बसें
सीटों से सीटों तक दौड़ते हैं धावक
दिन-रात.

2

पैदल पारपथ से बाहर निकलते ही
बारिश.

और सप्ताह में पहली बार
ख़ुशी.

3

अवसाद और तनाव में क्या है अंतर
दफ्तर में पूछता है कोई.

अवसाद में नहीं रह सकता कोई खुश
तनाव में रह भी सकता है
कुछ सोचकर कहता हूँ मैं.

4

समय बीतने से पहले
बीत जायेंगे हम

घड़ियाँ तकते-तकते
सुबहों में खिसकाते अलार्म.

5

अलस्सुबह
मोबाइल पर बात करता एक शहर

कहाँ हो रही हैं इतनी बातें
कौन कर रहा है इतनी बातें
मैं क्यूं नहीं हूँ इनके बीच

6

दिन बीतते बीतते
स्ट्रीटलाईट की रोशनी में
भली लगने लगती है दिल्ली

पीली आभा में चमकते
चेहरे लगते हैं
खुद से कुछ कम थके.

7

सर्दी की एक सुबह
बीच रास्ते स्कूटर बंद.

सालों के अपने इस दोस्त को
घसीटने से पस्त
और आधी छुट्टी कटने के भय से
मैं कर आया उसे
चांदीवाला अस्पताल के बाहर
टिनोपाल के नीचे बैठे
अलीम ओटो मैकेनिक के सुपुर्द

दिन भर उसका चेचक भरा चेहरा
रहा मेरे जेहन में छाया
दिन भर उसे सुनती होगी अचानक
स्कूटर से टिक-टिक की आवाज़

8

रमजान की एक दोपहर
ट्रैफिक जाम.

तिरझे, सड़क रोकते
इस अट्ठारह-पहिये वाले वाहन के उस ओर
झुके होंगे सैकडों सर

कोई दूर से चिल्लाता
जिबह!

समर्थ वाशिष्ठ


प्रतिलिपि, 2009
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