Hindi Poems

दिल्ली

1

कैसा गज़ब है ये शहर
जहाँ कहीं से कहीं तक कोई बस नहीं जाती.

बसों से बसों तक चलती हैं बसें
सीटों से सीटों तक दौड़ते हैं धावक
दिन-रात.

2

पैदल पारपथ से बाहर निकलते ही
बारिश.

और सप्ताह में पहली बार
ख़ुशी.

3

अवसाद और तनाव में क्या है अंतर
दफ्तर में पूछता है कोई.

अवसाद में नहीं रह सकता कोई खुश
तनाव में रह भी सकता है
कुछ सोचकर कहता हूँ मैं.

4

समय बीतने से पहले
बीत जायेंगे हम

घड़ियाँ तकते-तकते
सुबहों में खिसकाते अलार्म.

5

अलस्सुबह
मोबाइल पर बात करता एक शहर

कहाँ हो रही हैं इतनी बातें
कौन कर रहा है इतनी बातें
मैं क्यूं नहीं हूँ इनके बीच

6

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ब्यौरे

हमेशा स्केच पर एक हल्की लकीर
ओह करता हूँ जिन्हें प्यार
तुम्हारी आँखों के दंतुल मशीनी पहिये
किसी जुलूस की हिलती पूँछ
नारों की पीले चेहरे
सड़क पर कोण काटता रिक्शेवाला
भौतिकी के नियमों में ऐसी आस्था
कर देती मेरा चेहरा सुर्ख़.

शाम की सैर के दौरान
मिलते हैं ब्रेख्त खड़े सड़क किनारे
भावशून्य से लेते नोट्स
अपने प्यार को अलविदा कहते लड़के पर.
कितना कुछ है जो वे दो चाहेंगे अपने बीच
और होगा नहीं कभी.
यंत्रों की यकसां हलचल में
उनके जीवन हो जायेंगे अलग.

आकाश में कौंध रही है बिजली
और खाली बादल तकता है उसे
मैं जानता हूँ.
या ये कि मेरी प्लेट में सजे फ्रेंच-फ्रायज़

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एक प्रेम गीत

हम जानते हैं इक बादलों सा अहसास
जो ओस की तरह आकाश से गिरकर
लदता जाता है हमारी पीठ पर

प्यार
हमारी नाक पर बैठा
इतराए

प्यार
फैला खुली हवा में
सूखता कपड़ों के मानिंद

एक स्त्री को तुम्हें
तुम्हारे तिलों और मुहासों समेत
जानने का आनंद

तुम्हारा एक स्त्री को जानना
अपनी टांग की ढीठ दाद से बेहतर

प्यार
घास में कुंद पत्ते
मसले जाते मखमली बागों में

प्यार
दिन के वे उलझे क्षण
जब हम होते समझदारी से परे

या अलस्सुबह

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प्रेतछाया

गुज़रता कुछ भी नहीं
पकता है भीतर
आइंस्टाइन के दुरूह सिद्धांत के बावजूद

तुम्हारी आँखों में रहती है
चौंधियाते उजाले से भरपूर एक रात
नासिका में बसीं
हजारों-हज़ार गंधों में एक खुशबू
नहीं जुड़ पाती किसी स्वाद के साथ

गाहे बगाहे
किसी दुःस्वप्न के कुटिल तर्क से भागते तुम
टूटती तंद्रा में पाते हो वे स्पर्श
जो होने न थे
न होने थे

समर्थ वाशिष्ठ


प्रतिलिपि, 2009
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पिता की पचासवीं सालगिरह पर

मेरे सपनों में तुम आते हो
उद्दंड युवक
गोद में पिल्ले को खिलाते

और मैं कल्पना करता हूं वे स्त्रियां
जो हो सकतीं थी मां
पुरुष जो होते तुम

(शायद तब मैं जन्मता
और गहरे प्यार से)

सपनों में पिघलते हैं मोम के पंख
दीवारों और फ़र्श पर बिखरते
जब हम गुज़रते हैं जलती घाटियों से
कविता और प्रेम पर करते बहस

पचास, मेरे कानों में कहते हो तुम
पचास, गूंज़ता है वापिस तुम्हारे पास
और हम चलते जाते हैं साथ-साथ
साल दर साल
जब एक भी दिन हो काटना मुश्किल

सिर्फ़ तुम्हारी दाढ़ी होती जाती है
कुछ और धवल
सिर्फ़ तुम्हारी आंखें खोती जाती हैं
कुछ चमक

समर्थ वाशिष्ठ

__________

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स्त्रियां

मैंने देखा है उन्हें
ऐन पगलाहट के क्षणों में भी
होश संभाले
चीख़ते-चिल्लाते
तानाशाह के कदमों से
अपने मारे जा चुके बेटों को उठाते

विशाल सेनाएं क़दमताल करतीं हैं
क्षितिज तक
आती हैं उन दिशाओं से जिनके बारे कोई नहीं जानता
चिंता में डूबी उनकी आंखों से गुज़र जाती हैं

उनके पास सिर्फ़ एक तिहाई इतिहास है
और सारी की सारी अफ़वाहें
वो धूल भरा पंख है
किसी शक्तिशाली सिंहासन के मुकुट में लगा हुआ

किसी चमकते हुए दिन पति छोड़ जाता है
लौटकर आते हैं बेटे भिक्षुओं के भेस में
एक स्त्री ढूंढ़ती है अपनी नींद के पांच घंटे

रात की मुर्दार शांति में सुबकती है मेरी मां

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प्रवास में याद: दो प्रेम कविताएं

1

मैंने जाना नहीं तुम्हें
जब थीं सोलह की
और ढूढ़ता रहा बरसों
तुम्हारे चेहरे पर उस उम्र का तेज।

तुमने खोदा मुझे बचपन से अचानक
और सींचा, ढाला, बनाया
अपने लिए
चुपचाप।

2

तुम कभी नहीं जान पाओ शायद
मैं कैसे जिया तुम्हारे बगैर

इकलौती आरामकुर्सी रही खाती हिचकोले
रोशनदान को तरसते कमरे के बीचोंबीच

जैसे मां ढके रही मेरे जुर्म-दोष बरसों-बरस
जूठे बर्तनों पर औंधी पड़ी रही तश्तरियां

बहुत कुछ ज़ाया गया शहर की नालियों में
जो लगना था कभी मेरे अंग

बहुत कुछ ख़ाक़ गया पकते वक़्त
जो कल्पना में रहा सुगंधों से भरपूर

सुबहों में सीढ़ियां बस उतरी हीं उतरी हीं
बिखरी रही मैली कमीज़ें हर ओर

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